॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 11.7.28
त्वं तु कल्पः कविर्दक्षः सुभगोऽमृतभाषणः।
न कर्ता नेहसे किंचिज्जडोन्मत्तपिशाचवत्॥ २८
tvaṃ tu kalpaḥ kavirdakṣaḥ subhago'mṛtabhāṣaṇaḥ|
na kartā nehase kiṃcijjaḍonmattapiśācavat|| 28
अर्थ
मैं देख रहा हूँ कि आप कर्म करनेमें समर्थ, विद्वान् और निपुण हैं। आपका भाग्य और सौन्दर्य भी प्रशंसनीय है। आपकी वाणीसे तो मानो अमृत टपक रहा है। फिर भी आप जड, उन्मत्त अथवा पिशाचके समान रहते हैं; न तो कुछ करते हैं और न चाहते ही हैं॥ २८॥