राजन्! किसी जंगलमें एक कबूतर रहता था, उसने एक पेड़पर अपना घोंसला बना रखा था। अपनी मादा कबूतरीके साथ वह कई वर्षोंतक उसी घोंसलेमें रहा॥ ५३॥✎ 17392146
कपोतः कश्चनारण्ये कृतनीडो वनस्पतौ।
कपोत्या भार्यया सार्धमुवास कतिचित् समाः॥ ५३
राजन्! किसी जंगलमें एक कबूतर रहता था, उसने एक पेड़पर अपना घोंसला बना रखा था। अपनी मादा कबूतरीके साथ वह कई वर्षोंतक उसी घोंसलेमें रहा॥ ५३॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 11.7.53 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 760) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/7/53/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)