श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.7.73

एकादश स्कन्ध · अध्याय 7 · अथ सप्तमोऽध्यायः

एवं कुटुम्ब्यशान्तात्मा द्वन्द्वारामः पतत्त्रिवत्।

पुष्णन् कुटुम्बं कृपणः सानुबन्धोऽवसीदति॥ ७३

evaṃ kuṭumbyaśāntātmā dvandvārāmaḥ patattrivat|

puṣṇan kuṭumbaṃ kṛpaṇaḥ sānubandho'vasīdati|| 73

अर्थ

जो कुटुम्बी है, विषयों और लोगोंके संग-साथमें ही जिसे सुख मिलता है एवं अपने कुटुम्बके भरण-पोषणमें ही जो सारी सुध-बुध खो बैठा है, उसे कभी शान्ति नहीं मिल सकती। वह उसी कबूतरके समान अपने कुटुम्बके साथ कष्ट पाता है॥ ७३॥

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