श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.8.12

एकादश स्कन्ध · अध्याय 8 · अथाष्टमोऽध्यायः

सायन्तनं श्‍वस्तनं वा न संगृह्णीत भिक्षुकः।

मक्षिका इव संगृह्णन् सह तेन विनश्यति॥ १२

sāyantanaṃ śvastanaṃ vā na saṃgṛhṇīta bhikṣukaḥ|

makṣikā iva saṃgṛhṇan saha tena vinaśyati|| 12

अर्थ

यह बात खूब समझ लेनी चाहिये कि संन्यासी सबेरे-शामके लिये किसी प्रकारका संग्रह न करे; यदि संग्रह करेगा तो मधुमक्खियोंके समान अपने संग्रहके साथ ही जीवन भी गँवा बैठेगा॥ १२॥

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