॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 11.8.15
न देयं नोपभोग्यं च लुब्धैर्यद् दुःखसंचितम्।
भुङ्क्ते तदपि तच्चान्यो मधुहेवार्थविन्मधु॥ १५
na deyaṃ nopabhogyaṃ ca lubdhairyad duḥkhasaṃcitam|
bhuṅkte tadapi taccānyo madhuhevārthavinmadhu|| 15
अर्थ
मैंने मधु निकालनेवाले पुरुषसे यह शिक्षा ग्रहण की है कि संसारके लोभी पुरुष बड़ी कठिनाईसे धनका संचय तो करते रहते हैं, किन्तु वह संचित धन न किसीको दान करते हैं और न स्वयं उसका उपभोग ही करते हैं। बस, जैसे मधु निकालनेवाला मधुमक्खियोंद्वारा संचित रसको निकाल ले जाता है वैसे ही उनके संचित धनको भी उसकी टोह रखनेवाला कोई दूसरा पुरुष ही भोगता है॥ १५॥