श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.8.19

एकादश स्कन्ध · अध्याय 8 · अथाष्टमोऽध्यायः

जिह्वयातिप्रमाथिन्या जनो रसविमोहितः।

मृत्युमृच्छत्यसद्बुद्धिर्मीनस्तु बडिशैर्यथा॥ १९

jihvayātipramāthinyā jano rasavimohitaḥ|

mṛtyumṛcchatyasadbuddhirmīnastu baḍiśairyathā|| 19

अर्थ

अब मैं तुम्हें मछलीकी सीख सुनाता हूँ। जैसे मछली काँटेमें लगे हुए मांसके टुकड़ेके लोभसे अपने प्राण गँवा देती है, वैसे ही स्वादका लोभी दुर्बुद्धि मनुष्य भी मनको मथकर व्याकुल कर देनेवाली अपनी जिह्वाके वशमें हो जाता है और मारा जाता है॥ १९॥

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