श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.8.2

एकादश स्कन्ध · अध्याय 8 · अथाष्टमोऽध्यायः

ग्रासं सुमृष्टं विरसं महान्तं स्तोकमेव वा।

यदृच्छयैवापतितं ग्रसेदाजगरोऽक्रियः॥ २

grāsaṃ sumṛṣṭaṃ virasaṃ mahāntaṃ stokameva vā|

yadṛcchayaivāpatitaṃ grasedājagaro'kriyaḥ|| 2

अर्थ

बिना माँगे, बिना इच्छा किये स्वयं ही अनायास जो कुछ मिल जाय—वह चाहे रूखा-सूखा हो, चाहे बहुत मधुर और स्वादिष्ट, अधिक हो या थोड़ा—बुद्धिमान् पुरुष अजगरके समान उसे ही खाकर जीवन-निर्वाह कर ले और उदासीन रहे॥ २॥

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