श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.8.43

एकादश स्कन्ध · अध्याय 8 · अथाष्टमोऽध्यायः

ब्राह्मण उवाच

एवं व्यवसितमतिर्दुराशां कान्ततर्षजाम्।

छित्त्वोपशममास्थाय शय्यामुपविवेश सा॥ ४३

evaṃ vyavasitamatirdurāśāṃ kāntatarṣajām|

chittvopaśamamāsthāya śayyāmupaviveśa sā|| 43

अर्थ

अवधूत दत्तात्रेयजी कहते हैं—राजन्! पिंगला वेश्याने ऐसा निश्‍चय करके अपने प्रिय धनियोंकी दुराशा, उनसे मिलनेकी लालसाका परित्याग कर दिया और शान्तभावसे जाकर वह अपनी सेजपर सो रही॥ ४३॥

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