श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.8.9

एकादश स्कन्ध · अध्याय 8 · अथाष्टमोऽध्यायः

स्तोकं स्तोकं ग्रसेद् ग्रासं देहो वर्तेत यावता।

गृहानहिंसन्‍नातिष्ठेद् वृत्तिं माधुकरीं मुनिः॥ ९

stokaṃ stokaṃ grased grāsaṃ deho varteta yāvatā|

gṛhānahiṃsannātiṣṭhed vṛttiṃ mādhukarīṃ muniḥ|| 9

अर्थ

राजन्! संन्यासीको चाहिये कि गृहस्थोंको किसी प्रकारका कष्ट न देकर भौंरेकी तरह अपना जीवन-निर्वाह करे। वह अपने शरीरके लिये उपयोगी रोटीके कुछ टुकड़े कई घरोंसे माँग ले*॥ ९॥

टिप्पणियाँ

  1. *

    नहीं तो एक ही कमलके गन्धमें आसक्त हुआ भ्रमर जैसे रात्रिके समय उसमें बंद हो जानेसे नष्ट हो जाता है, उसी प्रकार स्वादवासनासे एक ही गृहस्थका अन्‍न खानेसे उसके सांसर्गिक मोहमें फँसकर यति भी नष्ट हो जायगा।

    (मुद्रित पृष्ठ 764)

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