श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.9.12

एकादश स्कन्ध · अध्याय 9 · अथ नवमोऽध्यायः

यस्मिन् मनो लब्धपदं यदेत-

च्छनैः शनैर्मुंचति कर्मरेणून्।

सत्त्वेन वृद्धेन रजस्तमश्‍च

विधूय निर्वाणमुपैत्यनिन्धनम्॥ १२

yasmin mano labdhapadaṃ yadeta-

cchanaiḥ śanairmuṃcati karmareṇūn|

sattvena vṛddhena rajastamaśca

vidhūya nirvāṇamupaityanindhanam|| 12

अर्थ

जब परमानन्दस्वरूप परमात्मामें मन स्थिर हो जाता है तब वह धीरे-धीरे कर्मवासनाओंकी धूलको धो बहाता है। सत्त्वगुणकी वृद्धिसे रजोगुणी और तमोगुणी वृत्तियोंका त्याग करके मन वैसे ही शान्त हो जाता है, जैसे ईंधनके बिना अग्‍नि॥ १२॥

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