श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.9.15

एकादश स्कन्ध · अध्याय 9 · अथ नवमोऽध्यायः

गृहारम्भोऽतिदुःखाय विफलश्‍चाध्रुवात्मनः।

सर्पः परकृतं वेश्म प्रविश्य सुखमेधते॥ १५

gṛhārambho'tiduḥkhāya viphalaścādhruvātmanaḥ|

sarpaḥ parakṛtaṃ veśma praviśya sukhamedhate|| 15

अर्थ

इस अनित्य शरीरके लिये घर बनानेके बखेड़ेमें पड़ना व्यर्थ और दुःखकी जड़ है। साँप दूसरोंके बनाये घरमें घुसकर बड़े आरामसे अपना समय काटता है॥ १५॥

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