श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.9.29

एकादश स्कन्ध · अध्याय 9 · अथ नवमोऽध्यायः

लब्ध्वा सुदुर्लभमिदं बहुसम्भवान्ते

मानुष्यमर्थदमनित्यमपीह धीरः।

तूर्णं यतेत न पतेदनुमृत्यु याव-

न्‍निःश्रेयसाय विषयः खलु सर्वतः स्यात्॥ २९

labdhvā sudurlabhamidaṃ bahusambhavānte

mānuṣyamarthadamanityamapīha dhīraḥ|

tūrṇaṃ yateta na patedanumṛtyu yāva-

nniḥśreyasāya viṣayaḥ khalu sarvataḥ syāt|| 29

अर्थ

यद्यपि यह मनुष्यशरीर है तो अनित्य ही—मृत्यु सदा इसके पीछे लगी रहती है। परन्तु इससे परमपुरुषार्थकी प्राप्ति हो सकती है; इसलिये अनेक जन्मोंके बाद यह अत्यन्त दुर्लभ मनुष्य-शरीर पाकर बुद्धिमान् पुरुषको चाहिये कि शीघ्र-से-शीघ्र, मृत्युके पहले ही मोक्ष-प्राप्तिका प्रयत्‍न कर ले। इस जीवनका मुख्य उद्देश्य मोक्ष ही है। विषय-भोग तो सभी योनियोंमें प्राप्त हो सकते हैं, इसलिये उनके संग्रहमें यह अमूल्य जीवन नहीं खोना चाहिये॥ २९॥

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