श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.9.3

एकादश स्कन्ध · अध्याय 9 · अथ नवमोऽध्यायः

न मे मानावमानौ स्तो न चिन्ता गेहपुत्रिणाम्।

आत्मक्रीड आत्मरतिर्विचरामीह बालवत्॥ ३

na me mānāvamānau sto na cintā gehaputriṇām|

ātmakrīḍa ātmaratirvicarāmīha bālavat|| 3

अर्थ

मुझे मान या अपमानका कोई ध्यान नहीं है और घर एवं परिवारवालोंको जो चिन्ता होती है, वह मुझे नहीं है। मैं अपने आत्मामें ही रमता हूँ और अपने साथ ही क्रीडा करता हूँ। यह शिक्षा मैंने बालकसे ली है। अतः उसीके समान मैं भी मौजसे रहता हूँ॥ ३॥

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