श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 2.1.17

द्वितीय स्कन्ध · अध्याय 1 · अथ प्रथमोऽध्यायः

अभ्यसेन्मनसा शुद्धं त्रिवृद्ब्रह्माक्षरं परम्।

मनो यच्छेज्जितश्वासो ब्रह्मबीजमविस्मरन्२॥ १७

abhyasenmanasā śuddhaṃ trivṛdbrahmākṣaraṃ param|

mano yacchejjitaśvāso brahmabījamavismaran|| 17

अर्थ

तत्पश्चात् परम पवित्र ‘अ उ म्’ इन तीन मात्राओंसे युक्त प्रणवका मन-ही-मन जप करे। प्राणवायुको वशमें करके मनका दमन करे और एक क्षणके लिये भी प्रणवको न भूले॥ १७॥✎ 116

टिप्पणियाँ

  1. २

    प्रा० पा०—मनुस्म०।

     

    (मुद्रित पृष्ठ 183)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #116 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् में → भगवान्‌में

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