तत्पश्चात् परम पवित्र ‘अ उ म्’ इन तीन मात्राओंसे युक्त प्रणवका मन-ही-मन जप करे। प्राणवायुको वशमें करके मनका दमन करे और एक क्षणके लिये भी प्रणवको न भूले॥ १७॥✎ 116
अभ्यसेन्मनसा शुद्धं त्रिवृद्ब्रह्माक्षरं परम्।
मनो यच्छेज्जितश्वासो ब्रह्मबीजमविस्मरन्॥ १७
तत्पश्चात् परम पवित्र ‘अ उ म्’ इन तीन मात्राओंसे युक्त प्रणवका मन-ही-मन जप करे। प्राणवायुको वशमें करके मनका दमन करे और एक क्षणके लिये भी प्रणवको न भूले॥ १७॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 2.1.17 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 183) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/2/1/17/
टिप्पणियाँ
२
प्रा० पा०—मनुस्म०।
(मुद्रित पृष्ठ 183)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
#116 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् में → भगवान्में