स्थिर चित्तसे भगवान्के श्रीविग्रहमेंसे किसी एक अंगका ध्यान करे। इस प्रकार एक-एक अंगका ध्यान करते-करते विषय-वासनासे रहित मनको पूर्णरूपसे भगवान्में ऐसा तल्लीन कर दे कि फिर और किसी विषयका चिन्तन ही न हो। वही भगवान् विष्णुका परमपद है, जिसे प्राप्त करके मन भगवत्प्रेमरूप आनन्दसे भर जाता है॥ १९॥✎ 116
तत्रैकावयवं ध्यायेदव्युच्छिन्नेन चेतसा।
मनो निर्विषयं युक्त्वा ततः किञ्चन न स्मरेत्।
पदं तत्परमं विष्णोर्मनो यत्र प्रसीदति॥ १९
स्थिर चित्तसे भगवान्के श्रीविग्रहमेंसे किसी एक अंगका ध्यान करे। इस प्रकार एक-एक अंगका ध्यान करते-करते विषय-वासनासे रहित मनको पूर्णरूपसे भगवान्में ऐसा तल्लीन कर दे कि फिर और किसी विषयका चिन्तन ही न हो। वही भगवान् विष्णुका परमपद है, जिसे प्राप्त करके मन भगवत्प्रेमरूप आनन्दसे भर जाता है॥ १९॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 2.1.19 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 183) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/2/1/19/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
#116 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् में → भगवान्में