॥ श्रीहरिः ॥
उरःस्थलं ज्योतिरनीकमस्य ग्रीवा महर्वदनं वै जनोऽस्य।
तपो रराटीं विदुरादिपुंसः सत्यं तु शीर्षाणि सहस्रशीर्ष्णः॥ २८
uraḥsthalaṃ jyotiranīkamasya grīvā maharvadanaṃ vai jano'sya|
tapo rarāṭīṃ vidurādipuṃsaḥ satyaṃ tu śīrṣāṇi sahasraśīrṣṇaḥ|| 28
अर्थ
आदिपुरुष परमात्माकी छातीको स्वर्गलोक, गलेको महर्लोक, मुखको जनलोक और ललाटको तपोलोक कहते हैं। उन सहस्र सिरवाले भगवान्का मस्तकसमूह ही सत्यलोक है॥ २८॥
उरःस्थलं ज्योतिरनीकमस्य ग्रीवा महर्वदनं वै जनोऽस्य।
तपो रराटीं विदुरादिपुंसः सत्यं तु शीर्षाणि सहस्रशीर्ष्णः॥ २८
आदिपुरुष परमात्माकी छातीको स्वर्गलोक, गलेको महर्लोक, मुखको जनलोक और ललाटको तपोलोक कहते हैं। उन सहस्र सिरवाले भगवान्का मस्तकसमूह ही सत्यलोक है॥ २८॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 2.1.28 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 184) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/2/1/28/