मनुष्य-जन्मका यही—इतना ही लाभ है कि चाहे जैसे हो—ज्ञानसे, भक्तिसे अथवा अपने धर्मकी निष्ठासे जीवनको ऐसा बना लिया जाय कि मृत्युके समय भगवान्की स्मृति अवश्य बनी रहे॥ ६॥✎ 115
एतावान् सांख्ययोगाभ्यां स्वधर्मपरिनिष्ठया।
जन्मलाभः परः पुंसामन्ते नारायणस्मृतिः॥ ६
मनुष्य-जन्मका यही—इतना ही लाभ है कि चाहे जैसे हो—ज्ञानसे, भक्तिसे अथवा अपने धर्मकी निष्ठासे जीवनको ऐसा बना लिया जाय कि मृत्युके समय भगवान्की स्मृति अवश्य बनी रहे॥ ६॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 2.1.6 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 181) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/2/1/6/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)