॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 2.10.1
अथ दशमोऽध्यायः
भागवतके दस लक्षण
श्रीशुक उवाच
अत्र सर्गो विसर्गश्च स्थानं पोषणमूतयः।
मन्वन्तरेशानुकथा निरोधो मुक्तिराश्रयः॥ १
atra sargo visargaśca sthānaṃ poṣaṇamūtayaḥ|
manvantareśānukathā nirodho muktirāśrayaḥ|| 1
अर्थ
श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! इस भागवतपुराणमें सर्ग, विसर्ग, स्थान, पोषण, ऊति, मन्वन्तर, ईशानुकथा, निरोध, मुक्ति और आश्रय—इन दस विषयोंका वर्णन है॥ १॥