॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 2.10.22
बोध्यमानस्य ऋषिभिरात्मनस्तज्जिघृक्षतः।
कर्णौ च निरभिद्येतां दिशः श्रोत्रं गुणग्रहः॥ २२
bodhyamānasya ṛṣibhirātmanastajjighṛkṣataḥ|
karṇau ca nirabhidyetāṃ diśaḥ śrotraṃ guṇagrahaḥ|| 22
अर्थ
जब वेदरूप ऋषि विराट् पुरुषको स्तुतियोंके द्वारा जगाने लगे, तब उन्हें सुननेकी इच्छा हुई। उसी समय कान, उनकी अधिष्ठातृदेवता दिशाएँ और श्रोत्रेन्द्रिय प्रकट हुई। इसीसे शब्द सुनायी पड़ता है॥ २२॥