अपानमार्गद्वारा एक शरीरसे दूसरे शरीरमें जानेकी इच्छा होनेपर नाभिद्वार प्रकट हुआ। उससे अपान और मृत्यु देवता प्रकट हुए। इन दोनोंके आश्रयसे ही प्राण और अपानका बिछोह यानी मृत्यु होती है॥ २८॥
आसिसृप्सोः पुरः पुर्या नाभिद्वारमपानतः।
तत्रापानस्ततो मृत्युः पृथक्त्वमुभयाश्रयम्॥ २८
अपानमार्गद्वारा एक शरीरसे दूसरे शरीरमें जानेकी इच्छा होनेपर नाभिद्वार प्रकट हुआ। उससे अपान और मृत्यु देवता प्रकट हुए। इन दोनोंके आश्रयसे ही प्राण और अपानका बिछोह यानी मृत्यु होती है॥ २८॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 2.10.28 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 231) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/2/10/28/