श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 2.10.32

द्वितीय स्कन्ध · अध्याय 10 · अथ दशमोऽध्यायः

गु३णात्मकानीन्द्रियाणि भूतादिप्रभवा गुणाः।

मनः सर्वविकारात्मा बुद्धिर्विज्ञानरूपिणी॥ ३२

guṇātmakānīndriyāṇi bhūtādiprabhavā guṇāḥ|

manaḥ sarvavikārātmā buddhirvijñānarūpiṇī|| 32

अर्थ

श्रोत्रादि सब इन्द्रियाँ शब्दादि विषयोंको ग्रहण करनेवाली हैं। वे विषय अहंकारसे उत्पन्‍न हुए हैं। मन सब विकारोंका उत्पत्तिस्थान है और बुद्धि समस्त पदार्थोंका बोध करानेवाली है॥ ३२॥

टिप्पणियाँ

  1. ३

    प्रा० पा०—भूतात्म०।

    (मुद्रित पृष्ठ 231)

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