मैंने तुम्हें भगवान्के स्थूल और सूक्ष्म—व्यक्त और अव्यक्त जिन दो रूपोंका वर्णन सुनाया है, ये दोनों ही भगवान्की मायाके द्वारा रचित हैं। इसलिये विद्वान् पुरुष इन दोनोंको ही स्वीकार नहीं करते॥ ३५॥✎ 181
अमुनी भगवद्रूपे मया ते अनुवर्णिते।
उभे अपि न गृह्णन्ति मायासृष्टे विपश्चितः॥ ३५
मैंने तुम्हें भगवान्के स्थूल और सूक्ष्म—व्यक्त और अव्यक्त जिन दो रूपोंका वर्णन सुनाया है, ये दोनों ही भगवान्की मायाके द्वारा रचित हैं। इसलिये विद्वान् पुरुष इन दोनोंको ही स्वीकार नहीं करते॥ ३५॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 2.10.35 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 232) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/2/10/35/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)