श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 2.10.42

द्वितीय स्कन्ध · अध्याय 10 · अथ दशमोऽध्यायः

स एवेदं जगद्धाता भगवान् धर्मरूपधृक्।

पुष्णाति स्थापयन् विश्‍वं तिर्यङ्नरसुरात्मभिः१॥ ४२

sa evedaṃ jagaddhātā bhagavān dharmarūpadhṛk|

puṣṇāti sthāpayan viśvaṃ tiryaṅnarasurātmabhiḥ|| 42

अर्थ

वे भगवान् जगत‍्के धारण-पोषणके लिये धर्ममय विष्णुरूप स्वीकार करके देवता, मनुष्य और पशु, पक्षी आदि रूपोंमें अवतार लेते हैं तथा विश्‍वका पालन-पोषण करते हैं॥ ४२॥

टिप्पणियाँ

  1. १

    प्रा० पा०—सुरादिभिः।

     

    (मुद्रित पृष्ठ 233)

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