netthaṃbhāvena hi paraṃ draṣṭumarhanti sūrayaḥ|| 44
अर्थ
परीक्षित्! महात्माओंने अचिन्त्यैश्वर्य भगवान्का इसी प्रकार वर्णन किया है। परन्तु तत्त्वज्ञानी पुरुषोंको केवल इस सृष्टि, पालन और प्रलय करनेवाले रूपमें ही उनका दर्शन नहीं करना चाहिये; क्योंकि वे तो इससे परे भी हैं॥ ४४॥
इत्थंभावेन कथितो भगवान् भगवत्तमः।
नेत्थंभावेन हि परं द्रष्टुमर्हन्ति सूरयः॥ ४४
परीक्षित्! महात्माओंने अचिन्त्यैश्वर्य भगवान्का इसी प्रकार वर्णन किया है। परन्तु तत्त्वज्ञानी पुरुषोंको केवल इस सृष्टि, पालन और प्रलय करनेवाले रूपमें ही उनका दर्शन नहीं करना चाहिये; क्योंकि वे तो इससे परे भी हैं॥ ४४॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 2.10.44 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 233) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/2/10/44/