॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 2.10.6
निरोधोऽस्यानुशयनमात्मनः सह शक्तिभिः।
मुक्तिर्हित्वान्यथारूपं स्वरूपेण व्यवस्थितिः॥ ६
nirodho'syānuśayanamātmanaḥ saha śaktibhiḥ|
muktirhitvānyathārūpaṃ svarūpeṇa vyavasthitiḥ|| 6
अर्थ
जब भगवान् योगनिद्रा स्वीकार करके शयन करते हैं, तब इस जीवका अपनी उपाधियोंके साथ उनमें लीन हो जाना ‘निरोध’ है। अज्ञानकल्पित कर्तृत्व, भोक्तृत्व आदि अनात्मभावका परित्याग करके अपने वास्तविक स्वरूप परमात्मामें स्थित होना ही ‘मुक्ति’ है॥ ६॥