श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 2.10.8

द्वितीय स्कन्ध · अध्याय 10 · अथ दशमोऽध्यायः

योऽध्यात्मिकोऽयं पुरुषः सोऽसावेवाधिदैविकः।

यस्तत्रोभयविच्छेदः पुरुषो१ ह्याधिभौतिकः॥ ८

yo'dhyātmiko'yaṃ puruṣaḥ so'sāvevādhidaivikaḥ|

yastatrobhayavicchedaḥ puruṣo hyādhibhautikaḥ|| 8

अर्थ

जो नेत्र आदि इन्द्रियोंका अभिमानी द्रष्टा जीव है, वही इन्द्रियोंके अधिष्ठातृदेवता सूर्य आदिके रूपमें भी है और जो नेत्रगोलक आदिसे युक्त दृश्य देह है, वही उन दोनोंको अलग-अलग करता है॥ ८॥

टिप्पणियाँ

  1. १

    प्रा० पा०—स स्मृतो।

    (मुद्रित पृष्ठ 229)

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