श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 2.3.17

द्वितीय स्कन्ध · अध्याय 3 · अथ तृतीयोऽध्यायः

आयुर्हरति वै पुंसामुद्यन्‍नस्तं च यन्‍नसौ।

तस्यर्ते यत्क्षणो नीत उत्तमश्लोकवार्तया॥ १७

āyurharati vai puṃsāmudyannastaṃ ca yannasau|

tasyarte yatkṣaṇo nīta uttamaślokavārtayā|| 17

अर्थ

जिसका समय भगवान् श्रीकृष्णके गुणोंके गान अथवा श्रवणमें व्यतीत हो रहा है, उसके अतिरिक्त सभी मनुष्योंकी आयु व्यर्थ जा रही है। ये भगवान् सूर्य प्रतिदिन अपने उदय और अस्तसे उनकी आयु छीनते जा रहे हैं॥ १७॥✎ 127 128

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #127 शब्दोंके बीचका स्थान: है।ये → है। ये
  • #128 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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