श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 2.5.13

द्वितीय स्कन्ध · अध्याय 5 · अथ पञ्चमोऽध्यायः

विलज्जमानया यस्य स्थातुमीक्षापथेऽमुया।

विमोहिता विकत्थन्ते ममाहमिति दुर्धियः॥ १३

vilajjamānayā yasya sthātumīkṣāpathe'muyā|

vimohitā vikatthante mamāhamiti durdhiyaḥ|| 13

अर्थ

यह माया तो उनकी आँखोंके सामने ठहरती ही नहीं, झेंपकर दूरसे ही भाग जाती है। परन्तु संसारके अज्ञानीजन उसीसे मोहित होकर ‘यह मैं हूँ, यह मेरा है’ इस प्रकार बकते रहते हैं॥ १३॥✎ 136 1581

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #136 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् से → भगवान्‌से
  • #1581 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: इच्छा-नुसार → इच्छानुसार

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