श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 2.5.25

द्वितीय स्कन्ध · अध्याय 5 · अथ पञ्चमोऽध्यायः

तामसादपि भूतादेर्विकुर्वाणादभून्‍नभः।

तस्य मात्रा गुणः शब्दो लिङ्गं यद् द्रष्टृदृश्ययोः॥ २५

tāmasādapi bhūtādervikurvāṇādabhūnnabhaḥ|

tasya mātrā guṇaḥ śabdo liṅgaṃ yad draṣṭṛdṛśyayoḥ|| 25

अर्थ

जब पंचमहाभूतोंके कारणरूप तामस अहंकारमें विकार हुआ, तब उससे आकाशकी उत्पत्ति हुई। आकाशकी तन्मात्रा और गुण शब्द है। इस शब्दके द्वारा ही द्रष्टा और दृश्यका बोध होता है॥ २५॥✎ 137 138

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #137 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #138 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् ने → भगवान्‌ने

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