वह ब्रह्माण्डरूप अंडा एक सहस्र वर्षतक निर्जीवरूपसे जलमें पड़ा रहा; फिर काल, कर्म और स्वभावको स्वीकार करनेवाले भगवान्ने उसे जीवित कर दिया॥ ३४॥✎ 139140
वर्षपूगसहस्रान्ते तदण्डमुदकेशयम्।
कालकर्मस्वभावस्थो जीवोऽजीवमजीवयत्॥ ३४
वह ब्रह्माण्डरूप अंडा एक सहस्र वर्षतक निर्जीवरूपसे जलमें पड़ा रहा; फिर काल, कर्म और स्वभावको स्वीकार करनेवाले भगवान्ने उसे जीवित कर दिया॥ ३४॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 2.5.34 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 202) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/2/5/34/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)