श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 2.5.34

द्वितीय स्कन्ध · अध्याय 5 · अथ पञ्चमोऽध्यायः

वर्षपूगसहस्रान्ते तदण्डमुदकेशयम्।

कालकर्मस्वभावस्थो जीवोऽजीवमजीवयत्॥ ३४

varṣapūgasahasrānte tadaṇḍamudakeśayam|

kālakarmasvabhāvastho jīvo'jīvamajīvayat|| 34

अर्थ

वह ब्रह्माण्डरूप अंडा एक सहस्र वर्षतक निर्जीवरूपसे जलमें पड़ा रहा; फिर काल, कर्म और स्वभावको स्वीकार करनेवाले भगवान्‌ने उसे जीवित कर दिया॥ ३४॥✎ 139 140

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #139 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् ने → भगवान्‌ने
  • #140 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् ने → भगवान्‌ने

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