जैसे सूर्य अपने मण्डलको प्रकाशित करते हुए ही बाहर भी प्रकाश फैलाते हैं, वैसे ही पुराणपुरुष परमात्मा भी सम्पूर्ण विराट् विग्रहको प्रकाशित करते हुए ही उसके बाहर-भीतर—सर्वत्र एकरस प्रकाशित हो रहा है॥ १६॥✎ 1992
स्वधिष्ण्यं प्रतपन् प्राणो बहिश्च प्रतपत्यसौ।
एवं विराजं प्रतपंस्तपत्यन्तर्बहिः पुमान्॥ १६
जैसे सूर्य अपने मण्डलको प्रकाशित करते हुए ही बाहर भी प्रकाश फैलाते हैं, वैसे ही पुराणपुरुष परमात्मा भी सम्पूर्ण विराट् विग्रहको प्रकाशित करते हुए ही उसके बाहर-भीतर—सर्वत्र एकरस प्रकाशित हो रहा है॥ १६॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 2.6.16 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 205) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/2/6/16/
टिप्पणियाँ
१
प्रा० पा०—प्रातपत्प्राणो।
(मुद्रित पृष्ठ 205)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
#1992 मुद्रणकी अपनी भूल (गीताप्रेसके पुराने संस्करणों और ग्रन्थकी अपनी गणनासे): (अशंमात्र) → (अंशमात्र)