श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 2.6.19

द्वितीय स्कन्ध · अध्याय 6 · अथ षष्ठोऽध्यायः

पादास्त्रयो बहिश्‍चा३सन्‍नप्रजानां य आश्रमाः।

अन्तस्त्रिलोक्यास्त्वपरो गृहमेधोऽबृहद्व्रतः४॥ १९

pādāstrayo bahiścāsannaprajānāṃ ya āśramāḥ|

antastrilokyāstvaparo gṛhamedho'bṛhadvrataḥ|| 19

अर्थ

जन, तप और सत्य—इन तीनों लोकोंमें ब्रह्मचारी, वानप्रस्थ एवं संन्यासी निवास करते हैं। दीर्घकालीन ब्रह्मचर्यसे रहित गृहस्थ भूलोक, भुवर्लोक और स्वर्लोकके भीतर ही निवास करते हैं॥ १९॥✎ 1582

टिप्पणियाँ

  1. ३

    प्रा० पा०—बहिस्त्वासन् प्रजानां त्रय आश्रमाः।

    (मुद्रित पृष्ठ 205)
  2. ४

    प्रा० पा०—महद्व्रतम्।

    (मुद्रित पृष्ठ 205)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1582 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: पुरुषोत्तम-भगवान् → पुरुषोत्तमभगवान्

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें