तब मैंने उनके अंगोंमें ही यज्ञके पशु, यूप (स्तम्भ), कुश, यह यज्ञभूमि और यज्ञके योग्य उत्तम कालकी कल्पना की॥ २३॥✎ 141142
तेषु यज्ञस्य पशवः सवनस्पतयः कुशाः।
इदं च देवयजनं कालश्चोरुगुणान्वितः॥ २३
तब मैंने उनके अंगोंमें ही यज्ञके पशु, यूप (स्तम्भ), कुश, यह यज्ञभूमि और यज्ञके योग्य उत्तम कालकी कल्पना की॥ २३॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 2.6.23 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 206) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/2/6/23/