श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 2.6.36

द्वितीय स्कन्ध · अध्याय 6 · अथ षष्ठोऽध्यायः

नाहं न यूयं यदृतां गतिं विदु-

र्न वामदेवः किमुतापरे सुराः।

तन्मायया मोहितबुद्धयस्त्विदं

विनिर्मितं चा२त्मसमं विचक्ष्महे॥ ३६

nāhaṃ na yūyaṃ yadṛtāṃ gatiṃ vidu-

rna vāmadevaḥ kimutāpare surāḥ|

tanmāyayā mohitabuddhayastvidaṃ

vinirmitaṃ cātmasamaṃ vicakṣmahe|| 36

अर्थ

मैं, मेरे पुत्र तुम लोग और शंकरजी भी उनके सत्यस्वरूपको नहीं जानते; तब दूसरे देवता तो उन्हें जान ही कैसे सकते हैं। हम सब इस प्रकार मोहित हो रहे हैं कि उनकी मायाके द्वारा रचे हुए जगत‍्को भी ठीक-ठीक नहीं समझ सकते, अपनी-अपनी बुद्धिके अनुसार ही अटकल लगाते हैं॥ ३६॥

टिप्पणियाँ

  1. २

    प्रा० पा०—त्वात्म०।

    (मुद्रित पृष्ठ 207)

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