श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 2.7.17

द्वितीय स्कन्ध · अध्याय 7 · अथ सप्तमोऽध्यायः

ज्यायान् गुणैरवरजोऽप्यदितेः सुतानां

लोकान् विचक्रम इमान् यदथाधियज्ञः।

क्ष्मां वामनेन जगृहे त्रिपदच्छलेन

याच्ञामृते पथि चरन् प्रभुभिर्न चाल्यः॥ १७

jyāyān guṇairavarajo'pyaditeḥ sutānāṃ

lokān vicakrama imān yadathādhiyajñaḥ|

kṣmāṃ vāmanena jagṛhe tripadacchalena

yācñāmṛte pathi caran prabhubhirna cālyaḥ|| 17

अर्थ

भगवान् वामन अदितिके पुत्रोंमें सबसे छोटे थे, परन्तु गुणोंकी दृष्टिसे वे सबसे बड़े थे। क्योंकि यज्ञपुरुष भगवान्‌ने इस अवतारमें बलिके संकल्प छोड़ते ही सम्पूर्ण लोकोंको अपने चरणोंसे ही नाप लिया था। वामन बनकर उन्होंने तीन पग पृथ्वीके बहाने बलिसे सारी पृथ्वी ले तो ली, परन्तु इससे यह बात सिद्ध कर दी कि सन्मार्गपर चलनेवाले पुरुषोंको याचनाके सिवा और किसी उपायसे समर्थ पुरुष भी अपने स्थानसे नहीं हटा सकते, ऐश्‍वर्यसे च्युत नहीं कर सकते॥ १७॥ ✎ 155

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #155 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् ने → भगवान्‌ने

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