श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 2.7.20

द्वितीय स्कन्ध · अध्याय 7 · अथ सप्तमोऽध्यायः

चक्रं च दिक्ष्वविहतं दशसु स्वतेजो

मन्वन्तरेषु मनुवंशधरो बिभर्ति।

दुष्टेषु राजसु दमं व्यदधात् स्वकीर्तिं

सत्ये त्रिपृष्ठ उशतीं प्रथयंश्‍चरित्रैः॥ २०

cakraṃ ca dikṣvavihataṃ daśasu svatejo

manvantareṣu manuvaṃśadharo bibharti|

duṣṭeṣu rājasu damaṃ vyadadhāt svakīrtiṃ

satye tripṛṣṭha uśatīṃ prathayaṃścaritraiḥ|| 20

अर्थ

वे ही भगवान् स्वायम्भुव आदि मन्वन्तरोंमें मनुके रूपमें अवतार लेकर मनुवंशकी रक्षा करते हुए दसों दिशाओंमें अपने सुदर्शनचक्रके समान तेजसे बेरोक-टोक—निष्कण्टक राज्य करते हैं। तीनों लोकोंके ऊपर सत्यलोकतक उनके चरित्रोंकी कमनीय कीर्ति फैल जाती है और उसी रूपमें वे समय-समयपर पृथ्वीके भारभूत दुष्ट राजाओंका दमन भी करते रहते हैं॥ २०॥✎ 156

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #156 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् ने → भगवान्‌ने

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