श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 2.7.31

द्वितीय स्कन्ध · अध्याय 7 · अथ सप्तमोऽध्यायः

नन्दं च मोक्ष्यति भयाद् वरुणस्य पाशाद्

गोपान् बिलेषु पिहितान् मयसूनुना च।

अह्न्यापृतं निशि शयानमतिश्रमेण

लोकं विकुण्ठमुपनेष्यति गोकुलं स्म॥ ३१

nandaṃ ca mokṣyati bhayād varuṇasya pāśād

gopān bileṣu pihitān mayasūnunā ca|

ahnyāpṛtaṃ niśi śayānamatiśrameṇa

lokaṃ vikuṇṭhamupaneṣyati gokulaṃ sma|| 31

अर्थ

वे नन्दबाबाको अजगरके भयसे और वरुणके पाशसे छुड़ायेंगे। मय दानवका पुत्र व्योमासुर जब गोपबालोंको पहाड़की गुफाओंमें बन्द कर देगा, तब वे उन्हें भी वहाँसे बचा लायेंगे। गोकुलके लोगोंको, जो दिनभर तो काम-धंधोंमें व्याकुल रहते हैं और रातको अत्यन्त थककर सो जाते हैं, साधनाहीन होनेपर भी, वे अपने परमधाममें ले जायँगे॥ ३१॥

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें