श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 2.7.33

द्वितीय स्कन्ध · अध्याय 7 · अथ सप्तमोऽध्यायः

क्रीडन् वने निशि निशाकररश्मिगौर्यां

रासोन्मुखः कलपदायतमूर्च्छितेन।

उद्दीपितस्मररुजां व्रजभृद्वधूनां

हर्तुर्हरिष्यति शिरो धनदानुगस्य॥ ३३

krīḍan vane niśi niśākararaśmigauryāṃ

rāsonmukhaḥ kalapadāyatamūrcchitena|

uddīpitasmararujāṃ vrajabhṛdvadhūnāṃ

harturhariṣyati śiro dhanadānugasya|| 33

अर्थ

वृन्दावनमें विहार करते हुए रास करनेकी इच्छासे वे रातके समय, जब चन्द्रमाकी उज्ज्वल चाँदनी चारों ओर छिटक रही होगी, अपनी बाँसुरीपर मधुर संगीतकी लम्बी तान छेड़ेंगे। उससे प्रेमविवश होकर आयी हुई गोपियोंको जब कुबेरका सेवक शंखचूड़ हरण करेगा, तब वे उसका सिर उतार लेंगे॥ ३३॥

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