जो निष्कपटभावसे अपना सर्वस्व और अपने-आपको भी उनके चरणकमलोंमें निछावर कर देते हैं, उनपर वे अनन्तभगवान् स्वयं ही अपनी ओरसे दया करते हैं और उनकी दयाके पात्र ही उनकी दुस्तर मायाका स्वरूप जानते हैं और उसके पार जा पाते हैं। वास्तवमें ऐसे पुरुष ही कुत्ते और सियारोंके कलेवारूप अपने और पुत्रादिके शरीरमें ‘यह मैं हूँ और यह मेरा है’ ऐसा भाव नहीं करते॥ ४२॥✎ 158159160
येषां स एव भगवान् दययेदनन्तः
सर्वात्मनाऽऽश्रितपदो यदि निर्व्यलीकम्।
ते दुस्तरामतितरन्ति च देवमायां
नैषां ममाहमिति धीः श्वशृगालभक्ष्ये॥ ४२
जो निष्कपटभावसे अपना सर्वस्व और अपने-आपको भी उनके चरणकमलोंमें निछावर कर देते हैं, उनपर वे अनन्तभगवान् स्वयं ही अपनी ओरसे दया करते हैं और उनकी दयाके पात्र ही उनकी दुस्तर मायाका स्वरूप जानते हैं और उसके पार जा पाते हैं। वास्तवमें ऐसे पुरुष ही कुत्ते और सियारोंके कलेवारूप अपने और पुत्रादिके शरीरमें ‘यह मैं हूँ और यह मेरा है’ ऐसा भाव नहीं करते॥ ४२॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 2.7.42 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 216) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/2/7/42/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (3)