श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 2.7.47

द्वितीय स्कन्ध · अध्याय 7 · अथ सप्तमोऽध्यायः

शश्‍वत् प्रशान्तमभयं प्रतिबोधमात्रं

शुद्धं समं सदसतः परमात्मतत्त्वम्।

शब्दो न यत्र पुरुकारकवान् क्रियार्थो

माया परैत्यभिमुखे च विलज्जमाना॥ ४७

śaśvat praśāntamabhayaṃ pratibodhamātraṃ

śuddhaṃ samaṃ sadasataḥ paramātmatattvam|

śabdo na yatra purukārakavān kriyārtho

māyā paraityabhimukhe ca vilajjamānā|| 47

अर्थ

परमात्माका वास्तविक स्वरूप एकरस, शान्त, अभय एवं केवल ज्ञानस्वरूप है। न उसमें मायाका मल है और न तो उसके द्वारा रची हुई विषमताएँ ही। वह सत् और असत् दोनोंसे परे है। किसी भी वैदिक या लौकिक शब्दकी वहाँतक पहुँच नहीं है। अनेक प्रकारके साधनोंसे सम्पन्‍न होनेवाले कर्मोंका फल भी वहाँतक नहीं पहुँच सकता। और तो क्या, स्वयं माया भी उसके सामने नहीं जा पाती, लजाकर भाग खड़ी होती है॥ ४७॥

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