श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 2.7.53

द्वितीय स्कन्ध · अध्याय 7 · अथ सप्तमोऽध्यायः

मायां वर्णयतोऽमुष्य ईश्‍वरस्यानुमोदतः।

शृण्वतः श्रद्धया नित्यं माययाऽऽत्मा न मुह्यति॥ ५३

māyāṃ varṇayato'muṣya īśvarasyānumodataḥ|

śṛṇvataḥ śraddhayā nityaṃ māyayā''tmā na muhyati|| 53

अर्थ

जो पुरुष भगवान्‌की अचिन्त्य शक्ति मायाका वर्णन या दूसरेके द्वारा किये हुए वर्णनका अनुमोदन करते हैं अथवा श्रद्धाके साथ नित्य श्रवण करते हैं, उनका चित्त मायासे कभी मोहित नहीं होता॥ ५३॥✎ 161 162 163 164

इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां द्वितीयस्कन्धे
ब्रह्मनारदसंवादे सप्तमोऽध्यायः॥ ७॥

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (4)
  • #161 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #162 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #163 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् ने → भगवान्‌ने
  • #164 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् से → भगवान्‌से

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें