śṛṇvataḥ śraddhayā nityaṃ māyayā''tmā na muhyati|| 53
अर्थ
जो पुरुष भगवान्की अचिन्त्य शक्ति मायाका वर्णन या दूसरेके द्वारा किये हुए वर्णनका अनुमोदन करते हैं अथवा श्रद्धाके साथ नित्य श्रवण करते हैं, उनका चित्त मायासे कभी मोहित नहीं होता॥ ५३॥✎ 161162163164
मायां वर्णयतोऽमुष्य ईश्वरस्यानुमोदतः।
शृण्वतः श्रद्धया नित्यं माययाऽऽत्मा न मुह्यति॥ ५३
जो पुरुष भगवान्की अचिन्त्य शक्ति मायाका वर्णन या दूसरेके द्वारा किये हुए वर्णनका अनुमोदन करते हैं अथवा श्रद्धाके साथ नित्य श्रवण करते हैं, उनका चित्त मायासे कभी मोहित नहीं होता॥ ५३॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 2.7.53 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 218) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/2/7/53/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (4)