ātmano bandhamokṣau ca vyavasthānaṃ svarūpataḥ|| 22
अर्थ
प्रलयके समय जो जीव प्रकृतिमें लीन रहते हैं, उनकी उत्पत्ति कैसे होती है? पाखण्डकी उत्पत्ति कैसे होती है? आत्माके बन्ध-मोक्षका स्वरूप क्या है? और वह अपने स्वरूपमें किस प्रकार स्थित होता है?॥ २२॥✎ 167168
यश्चानुशायिनां सर्गः पाखण्डस्य च सम्भवः।
आत्मनो बन्धमोक्षौ च व्यवस्थानं स्वरूपतः॥ २२
प्रलयके समय जो जीव प्रकृतिमें लीन रहते हैं, उनकी उत्पत्ति कैसे होती है? पाखण्डकी उत्पत्ति कैसे होती है? आत्माके बन्ध-मोक्षका स्वरूप क्या है? और वह अपने स्वरूपमें किस प्रकार स्थित होता है?॥ २२॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 2.8.22 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 220) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/2/8/22/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)