श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 2.9.16

द्वितीय स्कन्ध · अध्याय 9 · अथ नवमोऽध्यायः

अध्यर्हणीयासनमास्थितं परं

वृतं चतुःषोडशपञ्चशक्तिभिः।

युक्तं भगैः स्वैरितरत्र चाध्रुवैः

स्व एव धामन् रममाणमीश्‍वरम्॥ १६

adhyarhaṇīyāsanamāsthitaṃ paraṃ

vṛtaṃ catuḥṣoḍaśapañcaśaktibhiḥ|

yuktaṃ bhagaiḥ svairitaratra cādhruvaiḥ

sva eva dhāman ramamāṇamīśvaram|| 16

अर्थ

वे एक सर्वोत्तम और बहुमूल्य आसनपर विराजमान हैं। पुरुष, प्रकृति, महत्तत्त्व, अहंकार, मन, दस इन्द्रिय, शब्दादि पाँच तन्मात्राएँ और पंचभूत—ये पचीस शक्तियाँ मूर्तिमान् होकर उनके चारों ओर खड़ी हैं। समग्र ऐश्‍वर्य, धर्म, कीर्ति, श्री, ज्ञान और वैराग्य—इन छः नित्यसिद्ध स्वरूपभूत शक्तियोंसे वे सर्वदा युक्त रहते हैं। उनके अतिरिक्त और कहीं भी ये नित्यरूपसे निवास नहीं करतीं। वे सर्वेश्‍वर प्रभु अपने नित्य आनन्दमय स्वरूपमें ही नित्य-निरन्तर निमग्न रहते हैं॥ १६॥

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