श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 2.9.34

द्वितीय स्कन्ध · अध्याय 9 · अथ नवमोऽध्यायः

यथा महान्ति भूतानि भूतेषूच्चावचेष्वनु१।

प्रविष्टान्यप्रविष्टानि तथा तेषु न तेष्वहम्॥ ३४

yathā mahānti bhūtāni bhūteṣūccāvaceṣvanu|

praviṣṭānyapraviṣṭāni tathā teṣu na teṣvaham|| 34

अर्थ

जैसे प्राणियोंके पंचभूतरचित छोटे-बड़े शरीरोंमें आकाशादि पंचमहाभूत उन शरीरोंके कार्यरूपसे निर्मित होनेके कारण प्रवेश करते भी हैं और पहलेसे ही उन स्थानों और रूपोंमें कारणरूपसे विद्यमान रहनेके कारण प्रवेश नहीं भी करते,वैसे ही उन प्राणियोंके शरीरकी दृष्टिसे मैं उनमें आत्माके रूपसे प्रवेश किये हुए हूँ और आत्मदृष्टिसे अपने अतिरिक्त और कोई वस्तु न होनेके कारण उनमें प्रविष्ट नहीं भी हूँ॥ ३४॥✎ 175

टिप्पणियाँ

  1. १

    प्रा० पा०—चेषु च।

    (मुद्रित पृष्ठ 226)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #175 शब्दोंके बीचका स्थान: श्रीभगवान् ने → श्रीभगवान्‌ने

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