श्रीशुकदेवजी कहते हैं—लोकपितामह ब्रह्माजीको इस प्रकार उपदेश देकर अजन्मा भगवान्ने उनके देखते-ही-देखते अपने उस रूपको छिपा लिया॥ ३७॥✎ 176177178179
सम्प्रदिश्यैवमजनो जनानां परमेष्ठिनम्।
पश्यतस्तस्य तद् रूपमात्मनो न्यरुणद्धरिः॥ ३७
श्रीशुकदेवजी कहते हैं—लोकपितामह ब्रह्माजीको इस प्रकार उपदेश देकर अजन्मा भगवान्ने उनके देखते-ही-देखते अपने उस रूपको छिपा लिया॥ ३७॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 2.9.37 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 227) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/2/9/37/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (4)