॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 2.9.8
दिव्यं सहस्राब्दममोघदर्शनो
जितानिलात्मा विजितोभयेन्द्रियः।
अतप्यत स्माखिललोकतापनं
तपस्तपीयांस्तपतां समाहितः॥ ८
divyaṃ sahasrābdamamoghadarśano
jitānilātmā vijitobhayendriyaḥ|
atapyata smākhilalokatāpanaṃ
tapastapīyāṃstapatāṃ samāhitaḥ|| 8
अर्थ
ब्रह्माजी तपस्वियोंमें सबसे बड़े तपस्वी हैं। उनका ज्ञान अमोघ है। उन्होंने उस समय एक सहस्र दिव्य वर्षपर्यन्त एकाग्र चित्तसे अपने प्राण, मन, कर्मेन्द्रिय और ज्ञानेन्द्रियोंको वशमें करके ऐसी तपस्या की, जिससे वे समस्त लोकोंको प्रकाशित करनेमें समर्थ हो सके॥ ८॥