॥ श्रीहरिः ॥
चतुर्थ स्कन्ध
श्रीमद्भागवतमहापुराणम्
चतुर्थः स्कन्धः
- 1अथ प्रथमोऽध्यायःस्वायम्भुव-मनुकी कन्याओंके वंशका वर्णन66 श्लोक
पृष्ठ 404 - 2अथ द्वितीयोऽध्यायःभगवान् शिव और दक्ष प्रजापतिका मनोमालिन्य35 श्लोक
पृष्ठ 411 - 3अथ तृतीयोऽध्यायःसतीका पिताके यहाँ यज्ञोत्सवमें जानेके लिये आग्रह करना25 श्लोक
पृष्ठ 415 - 4अथ चतुर्थोऽध्यायःसतीका अग्निप्रवेश34 श्लोक
पृष्ठ 419 - 5अथ पञ्चमोऽध्यायःवीरभद्रकृत दक्षयज्ञविध्वंस और दक्षवध26 श्लोक
पृष्ठ 423 - 6अथ षष्ठोऽध्यायःब्रह्मादि देवताओंका कैलास जाकर श्रीमहादेवजीको मनाना53 श्लोक
पृष्ठ 427 - 7अथ सप्तमोऽध्यायःदक्षयज्ञकी पूर्ति61 श्लोक
पृष्ठ 434 - 8अथाष्टमोऽध्यायःध्रुवका वन-गमन82 श्लोक
पृष्ठ 442 - 9अथ नवमोऽध्यायःध्रुवका वर पाकर घर लौटना67 श्लोक
पृष्ठ 452 - 10अथ दशमोऽध्यायःउत्तमका मारा जाना, ध्रुवका यक्षोंके साथ युद्ध30 श्लोक
पृष्ठ 460 - 11अथैकादशोऽध्यायःस्वायम्भुव-मनुका ध्रुवजीको युद्ध बंद करनेके लिये समझाना35 श्लोक
पृष्ठ 463 - 12अथ द्वादशोऽध्यायःध्रुवजीको कुबेरका वरदान और विष्णुलोककी प्राप्ति52 श्लोक
पृष्ठ 467 - 13अथ त्रयोदशोऽध्यायःध्रुववंशका वर्णन, राजा अंगका चरित्र49 श्लोक
पृष्ठ 473 - 14अथ चतुर्दशोऽध्यायःराजा वेनकी कथा46 श्लोक
पृष्ठ 478 - 15अथ पञ्चदशोऽध्यायःमहाराज पृथुका आविर्भाव और राज्याभिषेक26 श्लोक
पृष्ठ 482 - 16अथ षोडशोऽध्यायःवन्दीजनद्वारा महाराज पृथुकी स्तुति27 श्लोक
पृष्ठ 485 - 17अथ सप्तदशोऽध्यायःमहाराज पृथुका पृथ्वीपर कुपित होना और पृथ्वीके द्वारा उनकी स्तुति करना36 श्लोक
पृष्ठ 488 - 18अथाष्टादशोऽध्यायःपृथ्वी-दोहन32 श्लोक
पृष्ठ 493 - 19अथैकोनविंशोऽध्यायःमहाराज पृथुके सौ अश्वमेध यज्ञ42 श्लोक
पृष्ठ 496 - 20अथ विंशोऽध्यायःमहाराज पृथुकी यज्ञशालामें श्रीविष्णुभगवान्का प्रादुर्भाव38 श्लोक
पृष्ठ 500 - 21अथैकविंशोऽध्यायःमहाराज पृथुका अपनी प्रजाको उपदेश52 श्लोक
पृष्ठ 504 - 22अथ द्वाविंशोऽध्यायःमहाराज पृथुको सनकादिका उपदेश63 श्लोक
पृष्ठ 512 - 23अथ त्रयोविंशोऽध्यायःराजा पृथुकी तपस्या और परलोकगमन39 श्लोक
पृष्ठ 519 - 24अथ चतुर्विंशोऽध्यायःपृथुकी वंशपरम्परा और प्रचेताओंको भगवान् रुद्रका उपदेश79 श्लोक
पृष्ठ 524 - 25अथ पञ्चविंशोऽध्यायःपुरंजनोपाख्यानका प्रारम्भ62 श्लोक
पृष्ठ 533 - 26अथ षड्विंशोऽध्यायःराजा पुरंजनका शिकार खेलने वनमें जाना और रानीका कुपित होना26 श्लोक
पृष्ठ 540 - 27अथ सप्तविंशोऽध्यायःपुरंजनपुरीपर चण्डवेगकी चढ़ाई तथा कालकन्याका चरित्र30 श्लोक
पृष्ठ 543 - 28अथाष्टाविंशोऽध्यायःपुरंजनको स्त्रीयोनिकी प्राप्ति और अविज्ञातके उपदेशसे उसका मुक्त होना65 श्लोक
पृष्ठ 546 - 29अथैकोनत्रिंशोऽध्यायःपुरंजनोपाख्यानका तात्पर्य85 श्लोक
पृष्ठ 553 - 30अथ त्रिंशोऽध्यायःप्रचेताओंको श्रीविष्णुभगवान्का वरदान51 श्लोक
पृष्ठ 563 - 31अथैकत्रिंशोऽध्यायःप्रचेताओंको श्रीनारदजीका उपदेश और उनका परमपद-लाभ31 श्लोक
पृष्ठ 569
॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय॥