परीक्षित्! नारदजीने उनकी अनेक प्रकारसे पूजा की और सुमधुर वचनोंमें उनके गुण और अवतारकी उत्कृष्टताका वर्णन किया। तब आदिपुरुष भगवान् ब्रह्माजीने प्रियव्रतकी ओर मन्द मुसकानयुक्त दयादृष्टिसे देखते हुए इस प्रकार कहा॥ १०॥
भगवानपि भारत तदुपनीतार्हणः सूक्तवाकेनातितरामुदितगुणगणावतारसुजयः प्रियव्रतमादिपुरुषस्तं सदयहासावलोक इति होवाच॥ १०॥
परीक्षित्! नारदजीने उनकी अनेक प्रकारसे पूजा की और सुमधुर वचनोंमें उनके गुण और अवतारकी उत्कृष्टताका वर्णन किया। तब आदिपुरुष भगवान् ब्रह्माजीने प्रियव्रतकी ओर मन्द मुसकानयुक्त दयादृष्टिसे देखते हुए इस प्रकार कहा॥ १०॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 5.1.10 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 577) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/5/1/10/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
#1043 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): प्रियव्रतमा-दिपुरुषस्तं → प्रियव्रतमादिपुरुषस्तं