श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 5.1.16

पञ्चम स्कन्ध · अध्याय 1 · अथ प्रथमोऽध्यायः

मुक्तोऽपि तावद्बिभृयात्स्वदेह-

मारब्धमश्नन्‍नभिमानशून्यः ।

यथानुभूतं प्रतियातनिद्रः

किं त्वन्यदेहाय गुणान्‍न वृङ्क्ते॥ १६

mukto'pi tāvadbibhṛyātsvadeha-

mārabdhamaśnannabhimānaśūnyaḥ |

yathānubhūtaṃ pratiyātanidraḥ

kiṃ tvanyadehāya guṇānna vṛṅkte|| 16

अर्थ

मुक्त पुरुष भी प्रारब्धका भोग करता हुआ भगवान्‌की इच्छाके अनुसार अपने शरीरको धारण करता ही है; ठीक वैसे ही जैसे मनुष्यकी निद्रा टूट जानेपर भी स्वप्नमें अनुभव किये हुए पदार्थोंका स्मरण होता है। इस अवस्थामें भी उसको अभिमान नहीं होता और विषयवासनाके जिन संस्कारोंके कारण दूसरा जन्म होता है, उन्हें वह स्वीकार नहीं करता॥ १६॥✎ 432

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #432 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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