श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 5.1.18

पञ्चम स्कन्ध · अध्याय 1 · अथ प्रथमोऽध्यायः

यः षट् सपत्नान् विजिगीषमाणो

गृहेषु निर्विश्य यतेत पूर्वम्।

अत्येति दुर्गाश्रित ऊर्जितारीन्

क्षीणेषु कामं विचरेद्विपश्चित्॥ १८

yaḥ ṣaṭ sapatnān vijigīṣamāṇo

gṛheṣu nirviśya yateta pūrvam|

atyeti durgāśrita ūrjitārīn

kṣīṇeṣu kāmaṃ vicaredvipaścit|| 18

अर्थ

जिसे इन छः शत्रुओंको जीतनेकी इच्छा हो, वह पहले घरमें रहकर ही उनका अत्यन्त निरोध करते हुए उन्हें वशमें करनेका प्रयत्न करे। किलेमें सुरक्षित रहकर लड़नेवाला राजा अपने प्रबल शत्रुओंको भी जीत लेता है। फिर जब इन शत्रुओंका बल अत्यन्त क्षीण हो जाय, तब विद्वान् पुरुष इच्छानुसार विचर सकता है॥ १८॥

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